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Poetry : बहुत मज़े में हूं जब से ये धंधा छोड़ दिया - हसीब सोज़

बहुत मज़े में हूं जब से ये धंधा छोड़ दिया,
उमीदें बांध के घर से निकलना छोड़ दिया।

ये  ख़्वाब  था मेरे  बच्चों के ख्वाब पूरे हों,
सो अपने आप को मैंने अधूरा छोड़ दिया।

तिरा जवाब  नहीं  भीख मांगने  वाले,
किसी के इश्क़ में तूने खज़ाना छोड़ दिया।

वो जिसकी बात पे बरसों से यार प्यासा था
मलाल ये है कि उसने भी प्यासा छोड़ दिया।

थे रात ख्वाब में अपने भी और पराए भी,
खुली जो आंख तो सबने अकेला छोड़ दिया।

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