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बंगाल चुनाव और मेरी राय - दुर्गापूजा क्लब का महत्व

 मैं बंगाल को बहुत क्लोज़ से जानता हुं । यही पढ़ा, बड़ा हुआ और इन्हीं लोगों के बीच रहकर काम कर रहा हूं ।  बड़ा प्रेम है बंगाल से । बांग्ला भाषा से, बांग्ला लिटरेचर , म्यूजिक खान पान हर चीज़ से। पीसीएस को तैयारी के समय बंगाल के इतिहास को भी काफी अच्छे से पढ़ा और यहां के कल्चर और संस्कृति को अच्छा से समझा । 



जब स्कूल में पढ़ रहा था और जवानी की दहलीज पर कदम रख रहा था तब मैंने कम्यूनिस्टों का दौर भी देखा जब लगता था कि इतना स्ट्रांग कैडर जिसका हो वो एक चुनाव हारी हो, अगला जीत लेगी । पर अगला चुनाव आते आते कम्यूनिस्टों का कोई कैडर बचा नहीं । अब वो कैडर ममता बनर्जीं का हो गया था ।अब यही कैडर बीजेपी का हो जाएगा और ममता बनर्जी अगले चुनावों में आपको और बुरी हालत में मिलेंगी । 

इसका कारण है - बंगाल के दुर्गापूजा क्लब । दुर्गापूजा क्लब सिर्फ नाम है, यहां काम होता है पूरे साल बैठकर कैरम बोर्ड खेलना । मोहल्ले भर के शोहदे दिन भर इन क्लबों में बैठकर कैरम बोर्ड खेलते रहते हैं । 

ज्ञात हो कि ये क्लब जब बनाए गए थे तो अंग्रेजों को धोखा देने के लिए । अंग्रेज कोई पोलीटिकल या सोशल रिफार्म खड़ा करने पर तो बंदिश  लगाते थे, पर रीलिजीयस मामलों से खुद को दूर रखते थे । तो दुर्गा पूजा क्लब सुनते ही अंग्रेज इसे रीलीजियस मामला समझते थे और उस दौर के तमाम युवा लोग इन क्लबों की आड़ में क्रांति की मुहिम चलाते थे । इंटलेक्चुअल डिस्कशन्स होती थीं । 


अंग्रेजों के जाने के बाद क्रांति की भावना से लबरेज इन उत्साही युवाओं के लिए क्रांति की कोई वजह नहीं रह गई । सीपीआई ने नकली आज़ादी बताकर इनकी इस भावना का दोहन शुरु किया और क्लब कल्चर को खूब बढ़ावा दिया । कुकुरमुत्ते की तरह क्लब कल्चर बढ़ा । सीपीआई के मोहल्ला आफिस की तरह इन क्लबों का इस्तेमाल हुआ । बंगाल में और कुछ भी हो खाना बहुत सस्ता है । तो इन क्रांतिकारियों को खाना, सूंटा, चाय और कैरमबोर्ड ये कम्युनिस्टों ने दिया । 

भले कुछ भी हो कम्युनिस्टों के पास कोई तो विजन था , जैसी भी हो देश के लिए एक तस्वीर थी उनके पास । कम्युनिस्टों के बाद ममता के पास तो कोई विजन नहीं था । इन क्लबों में बच गया बस चाय, सूंटा और कैरमबोर्ड । बंगाल एक मात्र ऐसा राज्य है जहां साल भर दुर्गा पूजा का इंतज़ार चलता है । दुर्गा पूजा पंडाल बनाने के लिए राज्य सरकार इन क्लबों में पैसा बांटती थी और ये बेरोजगार पूरे साल उसी पैसे से चाय सूटा करते थे ।

ममता की मुस्लिम परस्त नीतियों के कारण क्लबों को ये पैसा कम हो गया , या कम से कम दुर्गा पूजा के नाम पर देना बंद हो गया । अब पार्टी आफिस के नाम पर वो पैसा आने लगा , पहले से बहुत कम ।

बीजेपी ने वहां पकड़ा है । सीपीएम के बाद जैसे ये कैडर ममता के हुए , अब ये बीजेपी के होंगे । खर्चा मात्र चाय सूंटा कैरमबोर्ड ।

रही बात  यहां रहने वाले बिहारियों  के खुशी का तो वह बस बेगाने शादी में अब्दुल्ला दीवाना हैं । 

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