भारत में लोकतंत्र हैं, बेशक इसे स्वीकार करते हुए ग़र मैं यह कहूँ कि इसी लोकतंत्र का चुनावी हिस्सा सबसे बड़ा धंधा भी हैं तो शायद आप चौक जाएंगे पर यही वास्तिवकता हैं । अब आप पूछेंगे कि कैसे ? तो चलिए कुछ आंकड़ों को देख लेते हैं फिर आप तय कीजियेगा कि यह चुनावी लोकतंत्र सबसे बड़ा धंधा है या नहीं !
शुरू करते हैं आज़ादी के बाद हुई पहली चुनाव से ।
1947 के बाद जो पहली राष्ट्रीय सरकार बनी उसके बाद चुनाव 1952 में चुनाव कराने के लिए इस रष्ट्रीय सरकार ने 10 करोड़ की बजट बनाई थी । अब आप सोच लीजिये कि उस समय यह रकम कितनी बड़ी रही होगी ।
खैर वो बात चुनाव खर्च की हैं जिस पर बाद में मैं एक आर्टिकल लिखूंगा । अभी आता हूँ चुनावी धंधा पे ।
याद कीजिये 2104 का आम चुनाव । गोवा में 2013 में मौजूदा गुजरात के सीएम नरेंद मोदी जी को भाजपा ने प्रधान मंत्री का कैंडिडेट घोषित कर चुका था तब 85 करोड़ 37 लाख का कॉरपरेट फंडिंग हो चुका था । यह घोषित फंडिंग हैं , अघोषित का डेटा तो भगवान ही जानता होगा या फिर वो राजनीतिक दल ।
अब आते हैं 2014 -15 में । मोदी जी अब प्रधानमंत्री बन चुके हैं । इसके बाद जो कॉरपोरेट फंडिंग होती हैं वो हैं - 1 अरब 77 करोड़ 65 लाख । अब आप कल्पना कीजिये इस राशि का और चौकिये मत । अब आगे बढ़ते हैं । 2016 में नोटबन्दी होती हैं और इसे कालाधन पर सबसे बड़ा प्रहार माना जाता हैं तो इस कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जो 2017 तक कॉरपोरेट फंडिंग होती हैं वो हैं- 6 अरब 36 करोड़ 88 लाख । तो गिनते जाइये कि अभी तक कॉरपोरेट ने कितना रुपया इन्वेस्ट कर चुका हैं । उंगली कम पर जाए तो कैलक्यूलेटर लेकर बैठिए और चौकिये मत अंतिम साल का भी पॉलिटिकल पार्टी को कॉरपोरेट फंडिंग जो मिला उसका डाटा भी ज़रा देखते जाइये । यह राशि हैं- 12 अरब 96 करोड़ 05 लाख । मतलब पुछले 3 साल के कुल फंडिंग का लगभग दोगुणा ।
इस पूरे फंडिंग में सिर्फ भाजपा को जो मिला हैं वो हैं 6 अरब 89 करोड़ 84 लाख रुपया और इसके बदले जो कॉरपोरेट को रियायत मिलती हैं वो हैं करीबन 60 अरब रुपये का, मतलब इन्वेस्टमेंट का करीबन 10 गुणा । तो यह धंधा घाटे का नहीं हैं किसी भी हिसाब से ।
तो अब आप खुद सोच लीजिये कि इन पाँच सालों में जो करीबन 23 अरब रुपये का फंडिंग कॉरपोरेट ने की हैं वो यूँ ही नहीं कि होगी उसके बदले वो कितना कमाता होगा इसका उदाहरण आपको मिल ही गया ।
अब यह भारत का चुनावी लोकतंत्र का महापर्व कहिये और उत्साह मनाइए । हम भी मनाएंगे । अब कर भी क्या कर सकते हैं जब इस सिस्टम का प्रोडक्ट्स बन ही गए हैं तो !
तो इस गरीब देश मे गरीबी हटाओ का नारा कितना बेईमानी हैं , आप खुद तय कर लीजिए ।
यब तो सिर्फ फंडिंग हैं पॉलिटिकल पार्टियों का जो बाद में ये कॉरपोरेट ऐंठ कर निकालते हैं ।
दूरी बात यह चुनाव कितना महंगा होता हैं इसका अंदाज़ा आप लगा सकते हैं तो लगा लें ।
आप कहिये कितना हो सकता हैं 100 अरब । नही महाराज हमने भी इसके डेटा पर जानकारी इक्कठा की हैं । 100 खरब रुपये भी कम हैं इस वर्ष के आम चुनाव के लिए । इस पर कल लिखेंगे फिलहाल उंगली पर जीरो गिनते रहे कि 100 खरब रुपये में कितनी होती हैं ।
शुक्रिया !! जय हिंद !!
©अनिल के राय
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