Ticker

6/recent/ticker-posts

Ad Code

Responsive Advertisement

अतिक्रमण के साथ विकास: नगर पालिका की नई परिभाषा

शहरों में अतिक्रमण कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन उसे लेकर प्रशासन का रवैया अब एक नई दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है। नियमों के अनुसार जिस अतिक्रमण को हटाया जाना चाहिए, उसे स्वीकार कर विकास कार्य करना शायद अब शहरी प्रबंधन का नया मॉडल बनता जा रहा है।

एक आवासीय क्षेत्र के कॉमन पैसेज पर पचास प्रतिशत से अधिक हिस्से पर किया गया अतिक्रमण इसका ताज़ा उदाहरण है। इस अतिक्रमण को लेकर कई बार शिकायत की गई। नगर पालिका ने भी अपनी औपचारिक जिम्मेदारी निभाते हुए नोटिस जारी किया—स्पष्ट निर्देश था कि सात दिनों के भीतर अतिक्रमण हटाया जाए

लेकिन सात दिन अब सात सौ दिनों में बदल चुके हैं।

नोटिस की समय-सीमा और व्यवस्था की चुप्पी

नोटिस देना प्रशासन की प्रक्रिया है, लेकिन उसका पालन कराना प्रशासन की जिम्मेदारी। जब तय समय-सीमा के बावजूद अतिक्रमण जस का तस बना रहता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की अवहेलना नहीं, बल्कि प्रशासनिक कमजोरी का प्रमाण बन जाता है।

यह और भी चिंताजनक तब हो जाता है जब नगर पालिका उसी स्थान पर रास्ता निर्माण का कार्य शुरू कर देती है—बिना अतिक्रमण हटाए। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि अतिक्रमण अवैध है, तो उसके साथ समायोजन क्यों? और यदि समायोजन ही समाधान है, तो नोटिस की आवश्यकता क्या थी?

नियमों की समानता पर सवाल

संपादकीय रूप में यह प्रश्न उठाना आवश्यक है कि—

  • क्या नियम सभी नागरिकों के लिए समान हैं?

  • क्या शिकायतों का उद्देश्य समाधान है या केवल फाइल पूरी करना?

  • और क्या विकास का अर्थ अब अवैध कब्ज़ों को स्वीकार करना हो गया है?

जब आम नागरिक वर्षों तक शिकायत करता रहे और परिणाम शून्य रहे, तो प्रशासन में जनता का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है।

अतिक्रमण हटाने की नहीं, निभाने की नीति?

नगर पालिका की यह कार्यप्रणाली यह संकेत देती है कि अतिक्रमण हटाने की जगह अब उसे निभाने और बचाने की नीति अपनाई जा रही है। यह न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि भविष्य में ऐसे अतिक्रमण को प्रोत्साहन भी देता है।

विकास और कानून एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए। यदि विकास अतिक्रमण के साथ होगा, तो कानून केवल काग़ज़ों तक सीमित रह जाएगा। नगर पालिका को यह तय करना होगा कि वह नियमों की संरक्षक है या अवैधताओं की समायोजक

यह संपादकीय किसी एक गली या एक पैसेज की बात नहीं करता, बल्कि उस सोच की ओर इशारा करता है, जहाँ कार्रवाई की जगह चुप्पी और न्याय की जगह सुविधा ने ले ली है।


Post a Comment

0 Comments