एक अंजान शहर। जहां की गलियों में तुम्हारा नाम कोई नहीं जानता। जहां की ठंडी हवा तुम्हारे होने का कोई सबूत नहीं ढूंढती। वह शहर, जहां आसमान धुंध से ढका होता है, और तुम्हारी परछाई भी तुमसे बेगानी लगती है।
रवि, जो कभी अपने शहर का जाना-माना चेहरा था, आज इस अंजान शहर में खुद को खोज रहा था। इंसान अकेले में ख़ुद को ही ढूंढ़ता हैं। बनावटी एहसास, दूसरों द्वारा गढ़ी हुई पुरानी यादें, ये सब जब साथ नहीं होता, लोग ख़ुद को ढूंढते हैं । शोरगुल से भरी भागती जिंदगी ख़ुद से कहां मिलने देता हैं । एक ऑटोमेटेड मशीन की तरह बस भागता रहता हैं ।
रवि ठंड भरी सुबह में एक कप चाय लिए गुमटी के पास बैठा, सड़क किनारे लगी लाइट की किरणों को निहार रहा था । इस कड़क ठंड में ये किरणे मानों रवि को एक गर्म एहसास दे रहा हो।
"यहां कोई मुझे नहीं जानता," उसने खुद से कहा। उसकी आवाज में राहत और अकेलेपन का एक अजीब मिश्रण था । अजनबीपन में वह अपनी खोई हुई शांति ढूंढ रहा था । इस शहर की ठंड, आसमान की खामोशी, और अनजान चेहरे—सब कुछ उसे अपनी पुरानी जिंदगी से दूर ले जाने का वादा कर रही थी।
गुमटी के ठीक सामने एक छोटी-सी मोमो की दुकान थी। वहां एक लड़की, नेहा, मोमो बेच रही थी। उसकी उम्र कोई 25-26 साल रही होगी, पर उसकी आँखों में एक अजीब-सी परिपक्वता और ठहराव था। वह रवि को देख रही थी। इतने लंबे समय तक कोई अकेला बैठा रहे, बिना किसी से बात किए, यह उसे अजीब लगा।
नेहा ने रवि को कुछ देर और देखा, फिर अपनी दुकान से खड़े होकर इशारे में बुलाया। रवि ने पहले अनदेखा किया, लेकिन नेहा ने फिर से हाथ हिलाया। इस बार रवि को हंसने का मन किया, और वह उठा और मोमो की दुकान की ओर चला गया।
"इतनी ठंड में दो घंटे से चाय पी रहे हो, कुछ खाओगे नहीं?" नेहा ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा।
रवि ने थोड़ा झेंपते हुए कहा, "बस यूं ही... भूख नहीं है।"
"भूख नहीं है या अकेले हो?" नेहा ने सीधे सवाल दाग दिया।रवि को उसका सवाल चुभा, पर वह झूठ नहीं बोल पाया। "शायद दोनों।"
नेहा ने मुस्कुराते हुए उसे एक प्लेट मोमो पकड़ा दी और कहा, "पहले खुद को थोड़ा ठीक करो। ठंड में ऐसे बैठोगे तो बीमार पड़ जाओगे।"
मोमो खाते-खाते रवि ने उससे बात शुरू की। नेहा ने बताया कि वह इस शहर में पिछले चार साल से मोमो की दुकान चला रही है। वो एक छोटे से गाँव से, कुछ करने की बड़े सपने लेकर आई थी पर समय के सामने किसका चला हैं ।
"इस शहर ने मुझे सब कुछ दिया है, लेकिन अकेलेपन का एहसास मुझे भी होता है।" नेहा ने आह भरी । रवि ने उसकी बात ध्यान से सुनी।
"तुम्हें डर नहीं लगता? अकेले इस दुकान को संभालते हुए?"
नेहा ने हंसते हुए कहा, "डरने से कुछ नहीं मिलता। अकेलापन जिंदगी का हिस्सा है। इसे दोस्त बना लो, तो सब आसान लगने लगता है। यह दुनिया एक बावरी हैं। बस मुस्कराते रहो । दुनिया भाड़ में चली जाए, तब भी । दुनिया को अपने तरीके से चलाना सीखों।
"बातें काफी बड़ी - बड़ी कर लेती हो ।" रवि उसे देखते हुए कहा ।
"बड़ी बातें यूं ही नहीं करती !" नेहा ने कहा .
"मतलब ?"
"मतलब, कुछ नहीं । ऐसे फेफड़े को इतना जला क्यों रहे हो !" नेहा ने कहा ।
"मतलब ?"
" अरे मतलब महाशय, इतना सिगरेट क्यों फुक रहे हो ?"
" बस ऐसे ही ।"
"तुम्हें कुछ खोजने की जरूरत नहीं। जो खोया है, उसे यही छोड़ दो। यहां से एक नई शुरुआत करो। कभी-कभी, जिंदगी का असली स्वाद मोमो और चाय के साथ मिलता है। सिगरेट के साथ नहीं ।"
रवि मुस्कुरा दिया । इस अंजान शहर में बारिश, ठंड, और मोमो की भाप के बीच, रवि को एक नई दोस्त मिल गई। वह ख़ुद से फिर नहीं मिल पाया । खुद को फिर कहीं पीछा छोड़, फिर इस संसार के जंजाल में खो गया । ख़ुद को खोजना इतना आसान नहीं होता । बुद्ध होना आसान नहीं।
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