पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिराकितना आसान था इलाज मिरा
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| फ़हमी साहब एक मुशायरे में ग़ज़ल सुनाते हुए |
बहुत बड़ी बात को यूँ ही कह देना, आसान नहीं होता | यह शेर पहली बार मैंने रील पर सुना था | 15 सेकेंड्स की रील मैं 15 मिनट तक देखता रह गया | यह शेर मानों मेरी अनकही हालात बयाँ कर दिया हों | मैं बस फ़हमी साहब को देखता रहा और सोचता रहा | इतनी आसानी से कोई कैसे इतनी बड़ी बात कह सकता हैं ! मैंने उनके और कई रील खोज़ - खोज कर देखने लगा -
मर गया हमको डाटने वाला
अब शरारत में जी नहीं लगता
तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं
कैसे मिलता कहीं पे था ही नहीं
काश वो रास्ते में मिल जाए
मुझ को मुँह फेर कर गुज़रना है
तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ
मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ
न जाने और कितने दिन तक अपने घर का दरवाज़ा
हमीं बाहर से खोलेंगे, हमीं अंदर से खोलेंगे
ये सब शेर सुनने के बाद मैं फ़हमी बदायुनी साहब का जबरा वाला फैन हो गया और इनके करीब सारे शेर पढ़ दाले |
आज जैसे ही मैंने सोशल मीडिया X ( पहले Twitter) खोला, उनके इंतकाल की खबर मिली जो मुझे काफी मायूस कर दिया | बीती 20 अक्टूबर को बदायूं ज़िले के बिसौली में बने छोटे से घर में उन्होंने हमेसा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं | उनके अंतिम समय में उनके साथ दी लल्लनटॉप (The Lallantop) के खबर के अनुसार उनके साथ उनके दो शागिर्द -चराग़ शर्मा और विनीत आश्ना थे जिन्हें विदा लेने से पहले फ़हमी बदायूनी अपनी कई सारी डायरियां श हवाले कर गए हैं | इस डायरी में उनके कई ऐसी ग़ज़लें हैं जो अभी तक प्रिंट नहीं हुई हैं | मुझे उम्मीद हैं कि बहुत ज़ल्दी ये प्रिंट भी होगा और इस दुनिया को उनके अनमोल ग़ज़लों से रु-ब-रु होने को मिलेगा |
72 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलबिदा कहा पर वे हम जैसे फैन के लिए एक 'नौजवान शायर' थें | उनके कुछ शेर पढ़िए फिर आपको एहसास होगा कि एक नौजवान शायर हमें अलविदा कह गया और पल आपके मन में उनकी ही जुबां में कह रहा होगा - "टहलते फिर रहे हैं सारे घर में, तेरी ख़ाली जगह को भर रहे हैं |"
ये 72 वर्ष के नौजवान क्यों थे, इनके शब्द बतातें हैं -
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| फ़हमी साहब एक मुशायरे में ग़ज़ल सुनाते हुए |
कमरा खोला तो आखें भर आई
ये जो खुशबु हैं जिस्म था पहले
मैं ने उस की तरफ़ से ख़त लिक्खा
और अपने पते पे भेज दिया
ख़त लिफ़ाफ़े में ग़ैर का निकला
उस का क़ासिद भी बे-वफ़ा निकला
तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ
मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ
ख़ुशी से काँप रही थीं ये उँगलियाँ इतनी
डिलीट हो गया इक शख़्स सेव करने में
जिस को हर वक़्त देखता हूँ मैं
उस को बस एक बार देखा है
वो देर से नज़र में आए, मगर जब आए, तो दिलों में बस गए :
फहमी साहब पर दुनिया की नज़र ज़रा देर से पड़ी , पर जब नज़र में आये तो करोड़ों के दिल पर छा गए | 2010 की शुरवाती दौर में उन्होंने अपने शेर दुनिया के हवाले करने शुरू किये | अक्सर वो अपने शेर को फेसबुक पर पोस्ट कर दिया करते थे , फिर क्या था ! धीरे-धीरे दुनिया ने उन शेरों पर गौर करना शुरू किया और अपने दिल में बिठा लिया |
वक्त की धारा में ग़ज़ल को नए मायने देने वाला शायर:
शायर के पास एक ख़ास नजरिया होता हैं जिससे वो दुनिया को देखते हैं | फ़हमी साहब के पास ये नज़रिया कुदरत ने दी थी जो मामली सी दुनिया में एक अलग ही मंज़र खोज लेते थे | ये बात उनकी ये ग़ज़लें कहती हैं -
एक रूमाल मिल गया है तिरा
अब वही ओढ़ते बिछाते हैं
पहले लगता था तुम ही दुनिया हो
अब ये लगता है तुम भी दुनिया हो
यूं उठे हैं हम उसकी महफ़िल से
जैसे उसके बग़ैर जी लेंगे
प्यासे बच्चे खेल रहे हैं
मछली मछली कितना पानी
ताने बैठा हूंँ आईने पे तीर
मैं निशाना भी हूंँ, शिकारी भी
उसने ख़त का जवाब भेजा है
चार लेकिन हैं एक हांँ के साथ
अलविदा फहमी साहब | आप जैसा ही शायद कोई आये जो आम बातों में पूरी दुनिया दिखा दें |
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