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टू रवीश कुमार

नमस्कार रवीश जी,
सोशल मीडिया और ब्लॉग के जमाने में भी खुला पत्र काफी ट्रोल कर रहा है और ये खुला पत्र किसी कागज़ पर नहीं बल्कि इसी डिजीटल प्लेटफॉर्म पर लिखा जा रहा हैं । हाँ सर, अब उस बंद लिफ़ाफ़े में छिपी पत्रों का क्या महत्व, इस तथा कथित पारदर्शिता जमाने में । अब मर्ज़ों को छिपाना क्या !
Ravish Kumar
 रवीश कुमार 

 ख़ैर जो भी हो । खुला पत्र लिखना कोई नयी बात नहीं । ये उस समय भी था जब कोई डिज़िटल प्लेटफॉर्म नहीं था  । और हाँ इस डिजिटल प्लेटफॉर्म का ही उपयोग कर खुला पत्र को नए बनाये रखने का श्रेय आपको ही जाता हैं ।
मैं आपका  हर खुला पत्र पढ़ता हूँ । जी हाँ, मैं क़स्बा का डेली रिडर हूँ । 
ऍम जे अकबर के नाम लिखा आपका खुला पत्र भी पढ़ा । जितने उत्साह के साथ मैंने इस पत्र को पढ़ने का शरुवात किया था, ठीक उतना ही मायूस होता गया । पत्र के शब्दों को लेकर , कुछ सोच को लेकर और आप के गुस्से को लेकर ।
जी पता है, हम बिहारी काफ़ी भावुक होते है और आपभी इसी भावुकता का शिकार होते हुए अपना गुस्सा ज़ाहिर किये हैं और गुस्सा ज़ायज़ भी है पर एक खुले पत्र में किसी और का सहारा लेकर ।  भराष् निकल गयी अच्छी बात है ।
आपके इस पत्र से एक चीज़ और पता चला । रोहित सरदाना जी की सोच । उनका भक्तिपन । और रोहित जी के शब्दों में ही रोहित जी का राष्ट्रवाद । अच्छा है कोई तो पत्रकार राष्ट्रवादी निकाला वरना यहाँ सब !!
काफ़ी विन्रमता से रोहित जी ने कुछ पत्रकारों पर कीचड़ उछाल दिए जिनमे आजतक के पत्रकार पूण्य प्रसणुय वाजपेयी जी भी हैं ।
चलिए "इज़ इक्वल टू" की बात रोहित जी ने तो कर दी । आपने उस समय ऐसा चिट्ठी क्यों नहीं लिखा ? अभी आप ये चिट्ठी कैसे लिख सकते है जब रोहित जी की मनपसंद सरकार हो या उस समय जो सत्ता की दलाली कर रहा हो । आप ने  ऐसा क्यों किया ? इसका ज़बाब तो आपको देना ही होगा !
 और हां सर आपने बरखा दत्त को चिट्ठी नहीं लिखी ये समझ सकता हूँ पर सुधीर चौधरी जी को तो लिखना चाहिए ।
आशा करता हूँ आपका अगला खुला पत्र सुधीर जी और रोहित जी के नाम होगा ।

आपका
यू ट्यूब के जामने में ब्लॉग रीडर 

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